आज के जमाने मे नौकरी मिलनी बहोत मुश्किल है और जादा पैसे भी नही मिल पाते इस लिए व्यापार ही एक ऐसा साधन है जिससे आप अमीर और रोजगार प्राप्त कर सकते है इस लिए आप मधुमक्खी पालन कर सकते है। इस business से आप मोम, शहद आदि का व्यापार कर सकते।
मधुमक्खी पालन-शहद के उत्पादन के लिए मधुमक्खियों के छत्तों का रख-रखाब ही मधुमक्खी पालन अथवा मौन पालन है।
मधुमक्खी पालन, मधुमक्खी, madhumakhi palan,
समान्य परिचय -
मधुमक्खी किट वर्ग का समाजिक प्राणी है जो स्वय के बनाय हुए मोम के छत्ते मे सघ बनाकर रहते है, जिसमे एक रानी कई सौ नर एवं बाकी श्रमिक होते है। एक छते मे इनकी सदस्य सख्या लगभग 20 हजार से 50 हजार तक होती है। छते से शहद प्राप्त होता है जो बहुत पौष्टिक होता है।
भारत मे पाई जाने वाली मधुमक्खीयो की प्रजातियां
- सारन्ग मधुमक्खी
- भवर मधुमक्खी
- छोटी मधुमक्खी
- डम्पर मधुमक्खी
- यूरोपियन मधुमक्खी
सारन्ग मधुमक्खी देशांतर स्वभाव की होने से इसका पालन नही किया जाता है। छोटी व डम्पर मधुमक्खी से शहद कम मिलता है जिससे आर्थिक दुष्टि से पालन नही किया जाता है यूरोपियन मधुमक्खी व भवर मधुमक्खी का कृतिम मधुमक्खी पालन
किया जाता है।
मधुमक्खी का कार्य विभाजन
मधुमक्खी को कार्य के आधार पर तीन वर्ग मे बाँट गया है
- रानी
- नर
- श्रमिक
1. रानी - छते की मुखिया रानी मधुमक्खी होती है ये दो से पाँच वर्ष तक ही जीवित रहती है। यह अपने जीवन मे एक बार ही उड़ान भर्ती है और मैथुन के बाद अपने छते मे ही अपना जीवन पुन करती है । छते मे इसकी संख्या एक होती है।
2. नर - नर का छते मे बस मैथुन का ही काम होता है और इसका कोई काम नही होता है। छते मे इसकी संख्या 20 - 200 तक होती है। जब छते मे भोजन की कमी होने लगे तब इन को श्र्मिको द्वारा छते से निकाल दिया जाता है।
3. श्रमिक - निषेचित अन्डो से लरवा अवस्था मे जिन को रायल जेली कम खाने को मिलती है हो श्रमिक बन जाते है। इन का कार्य
- छतों की सुरक्षा करना
- बच्चो को खाना खिलाना
- छत्ते की मर्मत करते है
- शहद बनाती है
इनके दो दल होते है एक जो फूलों का पता करता है और दूसरा जो फूलों से रस लाता है।
मधुमक्खी पालन कैसे करे
कृतिम मधुमक्खी छत्ते मे जो एक लकड़ी के बक्से नुमा सरचना होती है उस मे मधुमक्खी पालन किया जाता है। जिसका एक हिस्सा दरवाजे के समान खुलने एवं बन्द करने वाला होता है। यह बॉक्स दो भगा मे बन्टा रहता है। उपरी भाग 1/4 होता है जो शहद का खण्ड कहलाता है नीचे का 3/4 भाग शिशुओ का खण्ड होता है।
दोनों भागो के बीच मे एक जाली इस प्रकार लगी रहती है की उस छिद्रो मे श्रमिक मधुमक्खी उपरी खण्ड मे आकर शहद इकट्ठा कर सके परंतु रानी ना आस्के अन्यथा वह शहद वाले खण्ड मे भी अंडे दे सकती है। यह बॉक्स पूरी तरह बन्द होता है नीचे की और एक छेद होता है जिससे केवल श्रमिक आजा सके रानी नही।
बॉक्स के अंदर कृतिम छता मोम की परत वाली धातु अथवा प्लास्टिक की प्लेट होती है जिसमे षटभुजाकार कोस्ट होते है जो छते के निर्माण हेतु आधार का कार्य करती है। इस प्रकार के छते की प्लेट को बक्से के उपर वाले खाली स्थान पर इस प्रकार एक दूसरे से उचित दूरी पर लगे होते है जिससे मधुमक्खी सामंतर लगे छतो को शहद से भर सकते है।
मौन ग्रह की स्थापना
मैदानी भाग में इस कार्य को शुरू करने का उपयुक्त समय अक्टूबर और फरवरी में होता है। इस समय एक स्थापित मौन वंशों से प्रथम वर्ष में 20 से 25 किलोग्राम दूसरे वर्ष से 35-40 किलोग्राम मधु का उत्पादन हो जाता है। स्थापना का प्रथम वर्ष ही कुछ महंगा पड़ता है। इसके बाद केवल प्रतिवर्ष 8 या 10 किलोग्राम चीनी एवं 0.500 किलोग्राम मोमी छत्ताधर का रिकरिंग खर्च रहता है। प्रति मौन वंश स्थापित करने में लगभग 2450 रूपये व्यय करना पड़ता है। उद्यान विभाग द्वारा तकनीकी सलाह मुफ्त दी जाती है। मधुमक्खी पालकों की मधुमक्खियों का प्रत्येक 10वें दिन निरीक्षण जो अत्यन्त आवश्यक है, विभाग में उपलब्ध मौन पालन में तकनीकी कर्मचारी से कराया जाता है।
कृतिम भोजन :
जब वातावरण मे ऋतु अनुसार पुष्प की कमी दिखाई दे तो इनको कृतिम भोजन यानी दो भाग चीनी मे एक भाग पानी मिलाकर देना चाहिए।
शहद निकालने के यन्त्र :
- सिर ढकने की जाली
- रबर के दस्ताने
- धुआँ यन्त्र
- लोहे की चपटी प्लेट
- चाकू
- शहद निकालने का उपकरण - इस यन्त्र मे छतो को डालकर इस तरह घुमाया जाता है जिस से शहद प्लेटो के कोस्टक पर अपकेंद्रीक बल द्वारा शहद को टोंटी खोल कर निकाल लिया जाता है।
मधुमक्खी को प्राकृतिक छत्ते से पकड़ कर पालन
किसी प्राकृति छते से ही शाम के समय रानी, नर व श्रमिक मधुमक्खीयो को पकड़कर कृतिम छत्ते मे छोड़ कर इनको खाने के लिए कुछ दिनों तक शरबत रखे।
कृतिम मधुमक्खी पालन केंद्र से लाकर भी इनको पाला जा सकता है
रानी को समय समय पर बदलते रहे
मधुमक्खी पालन के लिए स्थान
कुछ दशकों से कृतिम छतो का विकास होने से आधुनिक मधुमक्खी पालन का विकास हुआ है। अत राजस्थान के दक्षिण, पूर्ण एवं उतरी भागो एवं जहाँ पर फ्सले जलवायु एवं पेड़ पौधों का अनुकूल है वही मधुमक्खी पालन किया जा r
रहा है।
मधु निष्कासन
आधुनिकतम ढंग से मधु निष्कासन कार्य किया जाता है, जिसमें अण्डे बच्चे का चैम्बर अलग होता है। शहद चैम्बर में मधु भर जाता है। मधु भर जाने पर मधु फ्रेम सील कर दिया जाता है। शील्ड भाग को चाकू से परत उतारकर मधु फ्रेम से निष्कासक यंत्र में रखने से तथा उसे चलाने से सेन्ट्रीफ्यूगल बल से शहद निकल आता है तथा मधुमक्खियों का पुनः मधु इकट्ठा करने के लिए दे दिया जाता है। इस प्रकार मधुमक्खी वंश का भी नुकसान नहीं होता है तथा मौसम होने पर लगभग पुनः शहद का उत्पादन हो जाता है।
मधुमक्खी का कृषि मे महत्व
मधुमक्खी के पीछे के पैरों पर रॉय दार बाल होते है जिससे जब मधुमक्खी फूलों का रस चुस्ती है तो उस के पैरो पर परागण चिप जाते है जिससे जब मधुमक्खी दूसरे पौधों पर जाती है तो परागण दूसरे पौधों पर चिपक जाते है जिससे परागण की क्रिया पुन हो जाती है पौधों मे परागण की क्रिया के बाद ही बीज बनते है।
इस प्रकार समस्त पृथ्वी जगत के फल वृक्षों, पुष्प, पादप, सब्जिया एवं खदान फसलो की परागण क्रिया मे 80 ℅ हिशे दारी मधुमक्खीयो की होती है कुछ पौधे मधुमक्खीयो पर ही निर्भर करते है।
परागण क्रिया के बाद नय जाती के पौधे उत्पन्न होते है
मधुमक्खी पालन का हमारे दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है- (1) शहद उच्च पोषक महत्त्व का आहार है तथा औषधियों में भी इसका प्रयोग किया जाता है।
( 2) मधुमक्खियाँ मोम भी पैदा करती हैं जिसका कांतिवर्धक वस्तुओं की तैयारी तथा विभिन्न प्रकार के पॉलिश वाले उद्योगों में प्रयोग किया जाता है।
(3) मधुमक्खयों हमारे बहुत से फसलों जैसे-सूर्यमुखी, सरसों, सेब तथा नाशपाती के लिए परागणक है। पुष्पीकरण के समय यदि इनके छत्तों को खेतों के बीच रख दिया जाये तो इससे पौधों की परागण क्षमता बढ़ जाती है और इस प्रकार फसल तथा शहद दोनों के उत्पादन में सुधार हो जाता है।
मधुमक्खी पालन के लाभ (मधुमक्खी पालन से कमाई)
- मधुमक्खी पालन व्यवसाय शुरू करनें के लिए बहुत ही कम समय में अधिक लाभ प्राप्त कर सकते है।
- मधुमक्खी पालन किसी समूह या एक व्यक्ति द्वारा शुरू किया जा सकता है, मार्किट में शहद और मोम की मांग काफी अधिक है।
- इस व्यवसाय के माध्यम से आप शहद और मोम के साथ ही रायल जेली उत्पादन, पराग, मौनी विष आदि प्राप्त कर सकते है।मधुमक्खी से मोम, शहद, और परागण की क्रिया पुन होती है। मधुमक्खी पालन आय का स्रोत है मधुमक्खी से शहद प्राप्त होता है जो बलवर्धक, पर्सनन्त प्रदान करने वाला, स्वादिष्ट शहद प्राप्त होता है।
इन सभी को बेच कर आय प्राप्त कर सकते है।
40 से 50 हजार की लागत में लाखों का मुनाफा
विशेषज्ञों के अनुसार, 15 पेटी से मधुमक्खी पालन की शुरुआत करने पर 40 से 50 हजार रुपये तक का खर्च आता है. मधुमक्खियों की संख्या भी हर साल बढ़ती जाती है. बता दें जितनी ज्यादा मधुमक्खियां बढ़ेंगी उतना ज्यादा ही शहद उत्पादन भी होगा और मुनाफा भी कई गुना बढ़कर लाखों का हो जाएगा

मधुमक्खी पालन लोन योजना
मधुमक्खी पालन योजना केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गयी एक महत्वपूर्ण योजना है सरकार द्वारा इस योजना को लांच करनें का मुख्य उद्देश्य देश के किसानों के साथ ही बेरोजगार लोगो को मधुमक्खी पालन की तरफ प्रोत्साहित करना है। यहाँ तक कि मधुमक्खी पालन व्यवसाय करनें वाले लोगो को इस कार्य के लिए वित्तीय सहायता सरकार द्वारा लोन के रूप में प्रदान की जाती है, इसके साथ ही लोन पर सब्सिडी भी दी जाती है दरअसल भारत की जलवायु मधुमक्खी पालन के अनुकूल है, जिसके कारण सरकार मधुमक्खी पालन द्वारा किसानों की आय में वृद्धि के लिए इस स्कीम की शुरुआत की है।
मधुमक्खी पालन पर मिल रही सब्सिडी
केंद्र सरकार ने एक योजना चलाई है जिसका नाम है मधुमक्खी पालन एवं हनी मिशन योजना. सरकार के इस योजना के तहत अनुदान लेने के लिए किसानों को सबसे पहले आवेदन करना होगा. जिसकी अंतिम तिथि 20 अगस्त रखी गई है. अतः इच्छुक किसान अपने नजदीकी कृषि संस्थान से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं. इस योजना के अंतर्गत मधुमक्खी पालक को 80फीसदी सब्सिडी दी जा रही है.
मधुमक्खी पालन से फसलों में मिलता है लाभ
फल-मेवे: बादाम,सेब, आड़ू, स्ट्राबेरी, खट्टे फल, लीची।
सब्जियां: पत्तागोभी, धनिया, खीरा, फूलगोभी, गाजर, नींबू, प्याज, कद्दू, खरबूज, शलगम हल्दी।
तिलहन: सूरजमुखी,सरसों, कुसुम, नाइजर, सफेद सरसों।
तिलचारा: लुसेरन,क्लोवर घास।
30 फीसदी तक बढ़ जाता है दूसरी फसलों का उत्पादन
मधुमक्खी पालन मे आने वाली समस्याय
- शहद की उच्च उपज के लिए मधुमक्खी कालोनियों के कारगर प्रबंध के लिए तकनीकी ज्ञान की कमी।
- शहद तथा अन्य छत्ता उत्पादों के उत्पादन के संदर्भ में घटिया गुणवत्ता का नियंत्रण।
- छत्ता के अन्य उत्पादों जैसे मधुमक्खियों का मोम, पराग, प्रापलिस, रॉयल जैली और मधुमक्खी के विष की तुलना में शहद के उत्पादन पर अधिक जोर देना।
- धन की कमी होना
- हानि कारक कीटो का प्रकोप
- हानि कारक रोगों से ये रोगाणु बीजाणु बनाते हैं, जिन्हें वयस्क मधुमक्खियां अपने भोजन के साथ ग्रहण कर लेती हैं। इसके बाद ज्यादातर संक्रमित मधुमक्खियां गंभीर पेचिश रोग से ग्रस्त हो जाती हैं और छत्ते के अंदर मल-मूत्र त्याग कर सकती हैं, जो सामान्य स्थितियों में कभी भी इतना ज्यादा नहीं होता है।
- मधुमक्खियों के प्रमुख शत्रु मोम पतंगे, ततैया, पक्षी, चींटियाँ, भृंगभृंग, कुटकी, चूहे आदि है।
मधुमक्खीयो को कीट व रोगों से बचाव का तरीके
- फ्यूमागिलिन नामक एंटीबायोटिक संक्रमण को नियंत्रित करने में उपयोगी है । 10 दिनों तक लगातार 250 मिली चीनी सिरप में प्रति कॉलोनी 100 मिलीग्राम फ्यूमागिलिन की खुराक देकर दवा दी जाती है। मधुमक्खी के बच्चे कई प्रकार की बीमारियों से पीड़ित होते हैं। ब्रूड का नुकसान कॉलोनी की ताकत को प्रभावित करता है।
- कीटनाशक का प्रयोग करे।
- रख रखाव का ध्यान दे।
- रोगाणु मुक्त स्थान का चुनाव
- छोटी - छोटी बीमारियों के उपचार के बारे मे पता होना चाहिए।
FAQ
1. रानी मधुमक्खी कैसे बनती है
Ans" रायल जेली खाने पर
2. भारत मे कहा - कहा मधुमक्खी पालन किया जाता है
Ans" बिहार, तमिलनाडू, केरल व मध्य प्रदेश मे होता है।
3. मधुमक्खी पालन को किया कहते है।
Asn" Apiculutre कहते है
4. शहद को गाडा कोन करता है।
Ans" श्रमिक मधुमक्खी अपने पखो से तेज तेज हवा कर के जल को वाष्प के रूप मे उड़ा देती है जिससे शहद गाडा हो जाता है।
5. मधुमक्खी पालन प्रशिक्षण केंद्र कहा है।
Aan " नमहादेव रोड, खादी ग्रामोद्योग, देहरादून. निदेशक, उद्यान विभाग, कृषि पंत भवन, जयपुर, राजस्थान. ल्यूपिन ह्यूपिन वेलफेयर एंड रिसर्च फाउंडेशन, कृष्णानगर, भरतपुर, राजस्थान. राष्ट्रीय बागबानी बोर्ड, लालकोठी, जयपुर, राजस्थान.
6. मधुमक्खी पालन में कितना खर्च आता है
Ans " छोटे पैमाने पर छोटे श्रमिकों के लिए Madhumakhi Palan की शुरूआत करने की बात करें तो अगर 20 (Boxes) से इस व्यवसाय को चालू करने में 1 लाख रूपये की लागत आएगी. और अगर 100 पेटियों की बात करें तो 5 लाख के करीब लागत आएगा.
7. मधुमक्खी की आयु कितनी होती है।
Ans" 5 वर्ष
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